कानूनसामाजिकसुरक्षास्वास्थ्य

कानून से ऊपर वर्दी?सिविल लाइन थाने के पुलिसकर्मी की दबंगई ने उजागर किया ‘डबल स्टैंडर्ड’

रायपुर।छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कानून का राज क्या सिर्फ आम नागरिकों के लिए है? यह सवाल सिविल लाइन थाने में पदस्थ एक पुलिसकर्मी की खुलेआम की जा रही नियमों की अवहेलना के बाद और गहरा हो गया है। यातायात नियमों का पालन कराने वाली वर्दी खुद ही कानून को ठेंगा दिखाए—तो फिर व्यवस्था की नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।सिविल लाइन थाना क्षेत्र में पदस्थ पुलिसकर्मी दुष्यंत जशपाल बिना हेलमेट, बिना वैध बीमा, बिना प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण-पत्र (PUC) और अनधिकृत ढोलकी साइलेंसर लगी बाइक से शहर में बेखौफ घूमते नज़र आए।

यह कोई एक बार की लापरवाही नहीं, बल्कि लगातार और जानबूझकर किया गया उल्लंघन बताया जा रहा है।चालान के बाद भी नहीं सुधरेसबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संबंधित पुलिसकर्मी के नाम पर ऑनलाइन चालान भी कट चुका है, इसके बावजूद न तो नियमों का पालन किया गया और न ही कानून का कोई डर दिखाई दिया। सवाल यह है कि जब चालान जैसी कार्रवाई भी वर्दीधारी को अनुशासन में नहीं ला पा रही, तो आम जनता से नियमों के पालन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

वही पुलिस, दोहरे मापदंडयह वही पुलिस तंत्र है जो आम नागरिक को हेलमेट न पहनने पर रोकता है, चालान काटता है, और सड़क सुरक्षा पर उपदेश देता है। लेकिन जब खुद पुलिसकर्मी ही कानून तोड़ते हैं, तो यह मामला व्यक्तिगत नहीं रह जाता—यह पूरे पुलिस विभाग की साख और विश्वसनीयता पर सीधा हमला बन जाता है।

कानूनन क्या कहता है मामलाप्राप्त जानकारी एवं उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार संबंधित पुलिसकर्मी द्वारा किए गए कृत्य मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत दंडनीय प्रतीत होते हैं— • धारा 129: दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट अनिवार्य • धारा 146: वैध मोटर वाहन बीमा अनिवार्य • धारा 190(2): वाहन में अनधिकृत संशोधन (ढोलकी साइलेंसर) दंडनीय अपराधइसके साथ ही, एक सेवारत पुलिसकर्मी द्वारा इस तरह का आचरण सेवा आचरण नियमों और विभागीय अनुशासन के भी स्पष्ट रूप से विरुद्ध है।‘इक्वैलिटी बिफोर लॉ’ पर चोटसंविधान सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता (Equality Before Law) का अधिकार देता है। लेकिन जब कानून लागू करने वाले ही नियमों का पालन न करें, तो यह सिद्धांत खोखला प्रतीत होने लगता है। ऐसे मामलों से जनता में यह संदेश जाता है कि कानून सिर्फ गरीब और आम आदमी के लिए है, जबकि वर्दीधारियों को विशेष संरक्षण प्राप्त है।

उठते गंभीर सवाल❗ क्या संबंधित पुलिसकर्मी को सत्ता या विभागीय संरक्षण प्राप्त है?❗ क्या विभागीय कार्रवाई केवल फाइलों और नोटशीट तक सीमित रह जाती है?❗ क्या वाकई कानून सबके लिए समान है, या वर्दी के लिए अलग नियम हैं?कार्रवाई नहीं तो टूटेगा भरोसायदि ऐसे खुले उल्लंघनों पर समय रहते सख्त, निष्पक्ष और सार्वजनिक कार्रवाई नहीं की गई, तो इसका सीधा असर जनता के भरोसे पर पड़ेगा। लोकतंत्र में पुलिस का सबसे बड़ा हथियार जनता का विश्वास होता है—और वही विश्वास ऐसे मामलों से लगातार कमजोर होता जा रहा है।अब निगाहें सरकार और पुलिस मुख्यालय पर टिकी हैं।क्या इस मामले में वास्तविक और उदाहरणात्मक कार्रवाई होगी?या फिर एक बार फिर यह साबित होगा कि वर्दी की आड़ में कानून को कुचला जा सकता है?यह केवल एक पुलिसकर्मी का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की ईमानदारी की कसौटी है।

आपको यह पोस्ट कैसा लगा ? समीक्षा जरूर दें!

Click on a star to rate it!

Average rating 0 / 5. Vote count: 0

No votes so far! Be the first to rate this post.

Sudhir Chouhan

पत्रकार सुधीर चौहान (संपादक) स्वतंत्र भारत न्यूज़ मो.नं.9098259961

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button