
हे मेरे गुरु, मेरे पथप्रदर्शक आचार्य दयासागर जी,
आपका जाना मेरे लिए असहनीय पीड़ा का क्षण है।
आज ही तो हम साथ बैठे थे।
आपने धर्मरक्षा महायज्ञ की पूर्णाहुति कराई,
कुशलगढ़ में विराट आयोजन को संपन्न कराया ,
हजारों लोगों को कंबल बांटकर
उनके जीवन में ममता और करुणा की ज्योति जगाई।
आज ही तो आपने नये गुरुकुल खोलने का संकल्प लिया,
और मैं यह सोच रहा था कि आप हमें
अनगिनत और प्रेरणाओं से आलोकित करेंगे।
हे ऋषि के अनुचर, इतनी जल्दी नहीं जाना था।
आपके कर्मों की यह तपस्या अधूरी नहीं लगती,
परंतु हमसे आपका सान्निध्य छूट जाना,
यह शून्य अपूर्ण रहेगा।**
आपने मुझे आदेश दिया था—
“आ जाओ।”
शायद आप जानते थे कि
आज आपका आशीर्वाद
मेरे जीवन का सबसे अनमोल पल बन जाएगा।
गुरुकुल तुरंगा, जो आपके ज्ञान की नींव पर खड़ा है,
आपके कर्मों की गाथा गाएगा।
हे कर्मयोगी, आपको शत-शत नमन।
आपकी हर सीख, हर आदर्श,
हमारे जीवन का पथ प्रदर्शक बनेगी।
आपके चरणों में मेरा श्रद्धापूर्ण प्रणाम।
आपका अपना राकेश आचार्य तुरंगा






