कानूनक्राइम

“वर्दी की कीमत वेतन से नहीं, चरित्र से चुकानी होती है: जशपुर में गांजा तस्करी कांड ने खाकी को कटघरे में खड़ा किया”

जशपुर, 3 मार्च। कानून की रखवाली का जिम्मा जिन कंधों पर होता है, अगर वही कंधे अपराध का बोझ उठाने लगें तो समाज का भरोसा डगमगा जाता है। जशपुर में 28 फरवरी को उजागर हुए गांजा तस्करी प्रकरण ने यही कड़वी सच्चाई सामने रख दी है। कोतवाली पुलिस की कार्रवाई में जहां दो कथित तस्कर गिरफ्तार हुए, वहीं तपकरा थाने में पदस्थ दो आरक्षक भी कानून के शिकंजे में आ गए।

किराए के मकान से खुली परतें

विवेकानंद कॉलोनी स्थित एक किराए के मकान पर पुलिस ने मुखबिर सूचना के आधार पर दबिश दी। तलाशी में 24 पैकेट गांजा बरामद हुआ। मकान में रह रहे रवि विश्वकर्मा ने पूछताछ में बताया कि यह खेप सुनील उर्फ गोविंद ने पैसों के लालच में वहां रखवाई थी। सुनील की गिरफ्तारी के बाद जो खुलासा हुआ, उसने पुलिस महकमे को भीतर तक झकझोर दिया।

जब अपने ही घेरे में आए

पूछताछ में सामने आया कि तपकरा थाने के दो आरक्षक—धीरेंद्र मधुकर और अमित त्रिपाठी—तस्करी के इस नेटवर्क को संरक्षण दे रहे थे। प्रारंभिक जांच में संलिप्तता की पुष्टि होते ही दोनों को भी NDPS एक्ट के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया।

यह कार्रवाई इस मायने में महत्वपूर्ण है कि विभाग ने अपने ही कर्मियों पर हाथ डालने में हिचक नहीं दिखाई। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता—यह शुरुआत है आत्ममंथन की।

वेतन बनाम “बाहरी कमाई”

सरकारी सेवा में नियुक्त हर पुलिसकर्मी को नियमित वेतन, भत्ते और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। यह व्यवस्था इसलिए है कि वह ईमानदारी से कानून का पालन कराए। लेकिन जब “अतिरिक्त कमाई” का प्रलोभन कर्तव्य से बड़ा हो जाए, तो परिणाम जेल की सलाखें ही होती हैं।

कुछ हजार या लाख की अवैध कमाई क्षणिक सुख दे सकती है, पर वह पूरी सेवा अवधि, परिवार की प्रतिष्ठा और आने वाली पीढ़ियों की साख दांव पर लगा देती है। यह मामला बताता है कि लालच का रास्ता अंततः बेइज्जती और बर्बादी की ओर ही जाता है।

पुलिस व्यवस्था के लिए संदेश

यह प्रकरण केवल चार आरोपियों की गिरफ्तारी भर नहीं है। यह पूरे तंत्र के लिए चेतावनी है कि—

वर्दी केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है।

जनता का भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है।

कानून तोड़ने वालों के लिए, चाहे वे वर्दी में हों या बाहर, एक ही कानून है।

समाज की उम्मीद

जशपुर पुलिस की कार्रवाई से यह संदेश जरूर गया है कि विभाग अपनी साख बचाने के लिए कठोर कदम उठा सकता है। लेकिन भरोसा तभी कायम रहेगा जब ऐसी घटनाओं पर शून्य सहिष्णुता की नीति लगातार लागू रहे।

खाकी की असली ताकत उसकी ईमानदारी में है, न कि अवैध आमदनी में। वेतन से गुजारा करना कठिन लग सकता है, पर बेइज्जती और जेल की जिंदगी उससे कहीं अधिक कठिन होती है। यह घटना उन सभी के लिए आईना है, जो कर्तव्य की राह छोड़कर लालच के रास्ते भटकने का विचार मन में पालते हैं।

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Sudhir Chouhan

पत्रकार सुधीर चौहान (संपादक) स्वतंत्र भारत न्यूज़ मो.नं.9098259961

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