
गरियाबंद:- जिले के अमलीपदर तेल नदी रपटा पर अचानक तेज बहाव आया और एक बाइक सवार बह गया। ग्रामीणों ने मानव श्रृंखला और रस्सी के सहारे उसकी जान तो बचा ली, लेकिन बाइक, मोबाइल और नगदी धारा में समा गए। यह हादसा कोई पहला नहीं है—सुखा तेल नदी पर अधूरे पड़े पुलिया की वजह से ऐसे खतरे रोज़ यहां के लोगों को झेलने पड़ रहे हैं।
आज़ादी के 79 साल बाद भी अमलीपदर क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। सुखा तेल नदी पर प्रस्तावित पुलिया इसका ज्वलंत उदाहरण है। 7 करोड़ 40 लाख रुपये की स्वीकृति मिलने के बावजूद एमजी एसोसिएट्स नामक कंपनी चार साल में पिल्लर भी खड़ा नहीं कर पाई। जब जनता की आवाज़ उठने लगी तो कंपनी को आनन फानन में प्रशासन द्वारा ब्लैकलिस्टेड कर दिया गया। इसके बाद विभाग और शासन प्रशासन ने लोगों को केवल आश्वासन ही दिया। पहले कहा गया था कि डेढ़ साल में पुलिया तैयार हो जाएगा, फिर टेंडर प्रक्रिया का हवाला दिया गया और अब हर बार वही बयान सुनने को मिलता है—“बारिश के बाद काम शुरू होगा।”
सवाल है कि चार साल से बारिश हर साल आई और गई, लेकिन काम चालू क्यों नहीं हुआ? क्या यह वाक्य अपनी नाकामी छुपाने का जरिया बन चुका है?
ग्रामीणों का दर्द किसी से छिपा नहीं। अमलीपदर–ध्रुवागुड़ी मार्ग, जिसे लोग ‘लाइफलाइन’ कहते हैं, बरसात में मौत का रास्ता बन जाता है। मासूम बच्चों को ट्रैक्टर पर बैठाकर या गोद में उठाकर नदी पार कराया जाता है। तीन साल पहले एक ग्रामीण की इसी नदी में डूबकर मौत हो चुकी है। हाल ही में पूर्णचंद्र साहू की बाइक, 12 हजार रुपये और मोबाइल नदी में बह गए, हालांकि ग्रामीणों ने उनकी जान बचा ली। कई बार शिक्षक और स्कूली बच्चे हादसों से बाल-बाल बचे हैं। ऐसे हालात में सवाल उठता है कि क्या यही है वह विकास, जिसकी तस्वीरें नेता मंच से दिखाते हैं?
आखिर कब तक यहां लोगों को मूलभूत सुविधाओं के लिए इंतजार करना पड़ेगा
इस पुलिया को लेकर क्षेत्र में कई बार धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल और चक्का जाम हो चुके हैं। एसडीएम से लेकर कलेक्टर और मंत्रियों तक आवेदन दिए गए, लेकिन हर बार नतीजा शून्य रहा। छोटे नेता इस मुद्दे को उठाकर बड़े बने, लेकिन बड़े बनने के बाद जनता से मुंह फेर लिए। देवभोग क्षेत्र में इसी तरह की समस्या पर तुरंत घोषणा हो गई, लेकिन अमलीपदर के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब जनता पूछ रही है—क्या इस क्षेत्र के लोगों की जिंदगी चुनावी गणित में उलझकर रह गई है?
बता दें कि आज हालात यह हैं कि पुलिया न होने के कारण आपात स्थिति में ग्रामीणों को 16 किलोमीटर लंबा चक्कर काटकर रायपुर मार्ग से गुजरना पड़ता है। मरीज हो या गर्भवती महिला—हर किसी की जिंदगी रोज़ खतरे से गुजर रही है। इस बीच सरकार और विभाग केवल चेतावनी बोर्ड लगाकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।
स्थानीय लोगों के मन में शासन प्रशासन के इस रवैए को लेकर गहरी नाराजगी देखने को मिल रही हैं।
अब सवाल उठता है चार साल बीत जाने के बाद भी आखिर काम पुरा क्यों नहीं हो सका कहीं शासन प्रशासन की नाकामी तो नहीं या राजनीतिक चाल ?
यह पुलिया सिर्फ एक अधूरा निर्माण नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी और जनता के साथ किया गया सबसे बड़ा मज़ाक बनकर रह गया है।






