
(रायगढ़)तमनार की धरती इन दिनों सिर्फ एक हिंसक घटना की नहीं, बल्कि समय पर न सुनी गई आवाज़ों, अनदेखी संवेदनाओं और सत्ता के अंधेपन की गवाही दे रही है। जिस आंदोलन की नींव माताओं की मूक प्रार्थनाओं, बच्चों की मासूम मौजूदगी और बुजुर्गों के धैर्य पर टिकी थी, वही आंदोलन एक रात में बदनामी और अपराध की कालिख से ढक दिया गया।तमनार हिंसा के मामले में महिला पुलिस कर्मियों पर हुए अमानवीय हमले ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। जिन हवाओं में संघर्ष और न्याय की मांग गूंजनी थी, उन्हीं हवाओं में एक महिला आरक्षक के कपड़े फाड़े गए, लूटपाट की गई और दुष्कर्म के प्रयास जैसे जघन्य कृत्य को अंजाम देने की कोशिश हुई। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। महिला पुलिस कर्मियों ने आक्रोश जताते हुए आरोपियों का जुलूस निकालने की मांग को लेकर जेल का घेराव किया—यह सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश थी।सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अपराध हुआ, बल्कि यह है कि यह अपराध होने दिया क्यों गया?अगर समय रहते आंदोलन को समाप्त कर लिया जाता,अगर समय रहते धरने पर बैठी माताओं, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के संयम और संघर्ष को पढ़ लिया जाता,अगर समय रहते निरस्तीकरण के कागजों को साहब पढ़ लेते,अगर समय रहते जिंदल कंपनी को यह अहसास हो जाता कि यह जनविरोध सिर्फ नारे नहीं, बल्कि जनचेतना है,तो शायद उस पुलिस बहन के साथ यह कायराना हरकत न होती।सत्रह दिनों की तपस्या, हजारों लोगों का त्याग और शांतिपूर्ण जनांदोलन—सब कुछ एक झटके में ढहा दिया गया। तमनार को बदनामी मिली, आंदोलन को बदनाम किया गया और असली मुद्दा हाशिए पर धकेल दिया गया। यह वही आंदोलन था, जिसे अगर संवेदनशीलता से संभाला जाता, तो असामाजिक तत्वों की घुसपैठ की गुंजाइश ही न बनती।आज जो हो रहा है, वह महज एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि आधुनिक समय का चीरहरण है। धृतराष्ट्र आज भी मौजूद हैं—आंखें होते हुए भी देखने से इनकार करते हुए। युग बदला है, लेकिन दुर्योधन और उसके सहयोगियों की मानसिकता नहीं बदली। सत्ता, अहंकार और स्वार्थ के गठजोड़ में वही पुरानी कथा दोहराई जा रही है, फर्क सिर्फ इतना है कि कुरुक्षेत्र अब गांवों की चौपालों और आंदोलन स्थलों पर फैल गया है।अब भी वक्त है। हर जगह, हर स्तर पर समय रहते सही न्याय होना चाहिए। क्योंकि इतिहास गवाह है—एक अपराध को नजरअंदाज किया गया, तो वही अपराध कई अपराधों को जन्म देता है और अंततः एक महाभारत रच देता है, जिसमें सबसे ज्यादा कीमत निर्दोष जनता और ईमानदार सिपाही चुकाते हैं।सबसे बड़ा प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—आखिर किसे इंतजार था कि कुछ अनहोनी हो?किसने खुद को समय से बड़ा और ताकतवर समझ लिया?और क्यों समय का तिरस्कार किया गया?काश, समय रहते धृतराष्ट्र (सत्ता) की आंखें खुल जातीं,तो यह दुस्साहस,यह दुशासन,इतिहास को एक और शर्मनाक अध्याय लिखने पर मजबूर न कर पाता।सुशासन!!






