
खसरा नंबर 251/1 के ‘छोटे-बड़े झाड़ के जंगल’ दर्ज होने का दावा, जांच में बड़े पैमाने पर वृक्ष कटाई की पुष्टि; ग्रामीणों ने खुदाई कराकर सच्चाई सामने लाने की उठाई मांग
रायगढ़। रायगढ़ तहसील क्षेत्र के संबलपुरी गांव में जमीन पर पेड़ों की कटाई का मामला सामने आने के बाद प्रशासन हरकत में आया है। मामले में बिल्डर दीपक डोरा समेत करीब छह संबंधित लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर जवाब और जमीन से जुड़े वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है। प्रारंभिक जांच में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई सामने आने की बात कही जा रही है। अब इस मामले में जमीन के राजस्व रिकॉर्ड, पट्टे की वैधता और पेड़ों की कटाई से जुड़े तथ्यों की जांच पर निगाहें टिकी हैं।
जंगल मद में दर्ज जमीन पर कटाई कैसे हुई?
मामले में सबसे अहम सवाल जमीन की राजस्व स्थिति को लेकर उठ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, खसरा नंबर 251/1 को राजस्व अभिलेखों में ‘छोटे-बड़े झाड़ के जंगल’ के रूप में दर्ज बताया गया है। वहीं, खसरा नंबर 251/2, 251/3 और 251/4 को मंगल चौहान से संबंधित आवंटन वाली भूमि बताया जा रहा है।
ऐसे में जांच का विषय है कि संबंधित जमीन की वास्तविक राजस्व स्थिति क्या है, भूमि का हस्तांतरण किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ और वहां पेड़ों की कटाई के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं। प्रशासन की जांच में इन बिंदुओं की पुष्टि होना महत्वपूर्ण होगा।
एसडीएम के निर्देश पर जांच, पेड़ों की कटाई की पुष्टि
शिकायत के बाद एसडीएम महेश शर्मा के निर्देश पर नायब तहसीलदार और राजस्व अधिकारियों की टीम ने मौके का निरीक्षण किया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जांच के दौरान बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई सामने आई है। साथ ही, जमीन पर दावे के लिए प्रस्तुत किए जा रहे पट्टे और संबंधित दस्तावेजों की वैधता को लेकर भी जांच की जा रही है।
प्रशासन ने संबंधित पक्षों को अपना जवाब प्रस्तुत करने का अवसर दिया है। दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के परीक्षण के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। हालांकि, किसी भी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए जांच के निष्कर्ष और संबंधित अभिलेखों का सत्यापन आवश्यक होगा।
ग्रामीणों का आरोप: जमीन में दबाए गए कटे पेड़ों के अवशेष
संबलपुरी के ग्रामीणों ने मामले को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि पेड़ों की कटाई के बाद उनके अवशेषों को जमीन में दबाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश की गई है। ग्रामीणों ने प्रशासन से विवादित स्थल पर जेसीबी से नियंत्रित खुदाई कराने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि जमीन की खुदाई होने पर पेड़ों के दबाए गए अवशेष मिलने की स्थिति में मामले की वास्तविकता सामने आ सकती है। हालांकि, जमीन में पेड़ों के अवशेष दबाए जाने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। प्रशासन द्वारा इस पहलू की जांच किए जाने से मामले में महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
सात दिन की समय-सीमा के बाद क्या होगा?
प्रशासन की ओर से जारी नोटिस के बाद अब संबंधित पक्षों के जवाब और प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों का इंतजार है। जांच में यदि जमीन के हस्तांतरण, पट्टे या वृक्ष कटाई में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि जमीन वास्तव में जंगल मद में दर्ज है, तो उसके उपयोग और हस्तांतरण की प्रक्रिया किन नियमों के तहत हुई? पेड़ों की कटाई की अनुमति किसने दी और क्या निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया?
अब संबलपुरी के ग्रामीणों की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। सात दिनों की समय-सीमा में सामने आने वाले जवाब, राजस्व रिकॉर्ड की जांच और पेड़ों की कटाई से जुड़े साक्ष्य यह तय करने में अहम होंगे कि मामले में आगे किस स्तर की कार्रवाई होती है। ग्रामीणों की मांग है कि जांच केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन की वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।
रायगढ़ प्रशासन की जांच और आगे की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि संबलपुरी में वन संपदा को हुए नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है और जमीन से जुड़े विवादित दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति क्या है।






