
रायगढ़, 15 मई 2026। तमनार क्षेत्र का पेलमा अब केवल एक प्रस्तावित परियोजना स्थल नहीं, बल्कि ‘विकास बनाम विश्वास’ की जमीनी लड़ाई का केंद्र बनता जा रहा है। 19 मई को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले ही जरीडीह, हिंझर, उरबा और लालपुर के ग्रामीणों ने जिस स्पष्टता और तीखेपन के साथ अपना रुख सामने रखा है, उसने प्रशासन के सामने असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन को सौंपे ज्ञापन में साफ कहा है—“जब तक मुआवजा और पुनर्वास पर लिखित, समान और पारदर्शी समझौता नहीं होगा, तब तक जनसुनवाई का कोई औचित्य नहीं है।”

“जनसुनवाई नहीं, पहले जनसहमति”
ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप यही है कि जनसुनवाई को एक औपचारिक प्रक्रिया बनाकर वास्तविक सहमति को दरकिनार किया जा रहा है। उनका कहना है कि अगर निर्णय पहले ही तय हैं, तो फिर जनसुनवाई केवल “कागजी खानापूर्ति” बनकर रह जाती है।
इस बार गांवों ने साफ कर दिया है—
👉 बिना ग्रामसभा की सहमति, कोई प्रक्रिया स्वीकार नहीं।
👉 बिना लिखित R&R (पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन) समझौते, कोई बातचीत नहीं।

मुआवजा: असमानता से उपजा असंतोष
ग्रामीणों का कहना है कि अलग-अलग गांवों और जमीनों के लिए अलग-अलग मुआवजा दर तय की जा रही है, जो सीधे तौर पर असमानता को जन्म देती है।
उनकी प्रमुख मांगें—
सभी प्रभावितों के लिए समान मुआवजा दर
भूमि के बदले भूमि की स्पष्ट नीति
हर प्रभावित परिवार को स्थायी रोजगार की गारंटी
ग्रामीणों का तर्क है कि जब जमीन एक जैसी है, तो मुआवजा अलग-अलग क्यों?
ग्रामसभाओं का सामूहिक फैसला
14 मई को चारों गांवों में आयोजित विशेष ग्रामसभाओं में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। यह केवल विरोध नहीं, बल्कि एक संगठित और सामूहिक निर्णय है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह “कुछ लोगों का आंदोलन” नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की आवाज है।
सीधी चेतावनी: “जबरदस्ती हुई तो सड़क पर उतरेंगे”
ज्ञापन में प्रशासन को साफ संदेश दिया गया है कि यदि 19 मई को बिना सहमति के जनसुनवाई कराने की कोशिश हुई, तो 2000 से अधिक ग्रामीण शांतिपूर्ण लेकिन व्यापक विरोध करेंगे।
यह चेतावनी केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था की दृष्टि से भी गंभीर संकेत है।
प्रशासन के लिए असली चुनौती
यह मामला अब सिर्फ एक परियोजना या जनसुनवाई तक सीमित नहीं रहा। यह उस भरोसे की परीक्षा बन गया है, जो सरकार और स्थानीय समुदाय के बीच होना चाहिए।
एक तरफ विकास परियोजनाओं की गति है,
तो दूसरी तरफ जमीन, आजीविका और अस्तित्व का सवाल।
जमीनी सच्चाई बनाम कागजी प्रक्रिया
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि—
“पहले हमारी शर्तों पर लिखित सहमति, फिर कोई प्रक्रिया।”
यह रुख बताता है कि अब गांव केवल सुनने के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं।
टकराव या संवाद—किसे चुनेगा प्रशासन?
पेलमा का यह विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
अगर प्रशासन संवाद और पारदर्शिता का रास्ता चुनता है, तो समाधान संभव है।
लेकिन यदि प्रक्रिया को थोपने की कोशिश हुई, तो यह विरोध और व्यापक रूप ले सकता है।
इस बार सवाल सिर्फ एक जनसुनवाई का नहीं है—
सवाल है कि क्या विकास, बिना सहमति के आगे बढ़ सकता है?






