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19 दिसंबर 1987: रायगढ़ के इतिहास का वो काला दिन – स्कूल बच्चों की मौत, पुलिस फायरिंग और कर्फ्यू से थमी जिंदगियां

रायगढ़:- आज से 36 वर्ष पहले 19 दिसंबर का वह दिन रायगढ़ के इतिहास में “काला दिवस” के रूप में दर्ज हो गया। यह दिन न केवल स्थानीय जनता के लिए दुःखद घटनाओं का गवाह बना, बल्कि पुलिस और जनता के बीच संघर्ष ने शहर को हिलाकर रख दिया। यह घटना न केवल रायगढ़वासियों की स्मृतियों में जिंदा है, बल्कि इसे भुलाना भी मुश्किल है। सुबह करीब 10:30 बजे लक्ष्मीपुर पुलिया पर बड़े वाहन ने सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल के दो छात्रों, मनीष और गोपाल, को कुचल दिया। इस दुर्घटना से आक्रोशित जनता ने चक्का जाम कर दिया। जल्द ही यह विरोध उग्र रूप ले गया, और पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा।

गोलीबारी और मौतें:
तत्कालीन SDM मालपानी द्वारा गोली चलाने का आदेश दिया गया। बताया जाता है कि इस गोलीबारी में लल्लू शर्मा, मुनाकी यादव, और मुंशी राम अग्रवाल जैसे कई लोग मारे गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ लोगों को जलते ट्रक में फेंक दिया गया और कई को पुलिस ने बेरहमी से पीटा यातायात थाना प्रभारी की बुलेट मोटरसाइकिल को भीड़ ने जला दिया। लक्ष्मीपुर ढलान पर जलते टायरों और वाहनों से उठता धुआं पूरे शहर में देखा जा सकता था।

कर्फ्यू का माहौल:
घटना के बाद एक सप्ताह तक रायगढ़ में कर्फ्यू लागू रहा। इस दौरान पुलिस ने सुनियोजित तरीके से पीले और गुलाबी कमीज़ पहने युवाओं को पकड़ना शुरू किया। कहा जाता है कि यह उन लोगों की पहचान थी, जो हिंसा में शामिल थे। कर्फ्यू के दौरान आम जनता भयभीत थी। स्कूलों में परीक्षाएं रद्द कर दी गईं। लोग अपने घरों में कैद हो गए, और शहर की गलियों में सन्नाटा पसरा रहा। कई लोगों ने बताया कि पुलिस की बर्बरता के दृश्य अब भी उनकी आंखों के सामने हैं।

घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने रायगढ़ का दौरा किया और घायलों से मुलाकात की। घटना में शामिल कई स्थानीय निवासियों और नेताओं के नाम FIR में दर्ज किए गए।

स्थानीय स्मृतियां….
आज भी सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल में मनीष और गोपाल के नाम से कक्षों का नामकरण किया गया है। घटना को याद करते हुए लोग भावुक हो जाते हैं। यह दिन रायगढ़वासियों के लिए केवल एक तारीख नहीं, बल्कि दर्द, आक्रोश और संघर्ष का प्रतीक बन गया है।हालांकि 19 दिसंबर 1987 की यह घटना पुरानी हो चुकी है, लेकिन इसके घाव आज भी हरे हैं। “काला दिवस” केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि किस प्रकार अराजकता और गलत फैसलों का खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। रायगढ़ के इतिहास के इस काले अध्याय को भुलाया नहीं जा सकता। यह घटना आज भी उन लोगों की याद दिलाती है, जिन्होंने इस दिन अपनी जान गंवाई।

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Sudhir Chouhan

पत्रकार सुधीर चौहान (संपादक) स्वतंत्र भारत न्यूज़ मो.नं.9098259961

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