
सरगुजा /विशेष रिपोर्ट:- लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। सच और समाजहित की आवाज उठाने वाली पत्रकारिता को आज अवैध कारोबार करने वाले ढाल बनाकर इस्तेमाल कर रहे हैं। नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी करने वाले हों या नशे के सौदागर – सभी का एक ही हथियार है, “मैं पत्रकार हूँ।”
अवैध कारोबारियों का नया हथियार: पत्रकारिता का नाम
फर्जी प्रेस कार्ड, नकली आईडी और मीडिया का ठप्पा लगाकर ठग गिरोह लाखों की ठगी कर रहे हैं। नशे का कारोबार करने वाले ‘मीडिया’ का नाम लेकर पुलिस-प्रशासन पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। नतीजा यह होता है कि असली पत्रकारों की मेहनत और ईमानदारी शक के घेरे में आ जाती है।
गाड़ियों पर ‘प्रेस’ लिखकर साजिश
अब अपराधियों का नया तरीका सामने आया है – गाड़ियों पर बड़े-बड़े अक्षरों में “PRESS” और “MEDIA” लिखकर घूमना। ऐसी गाड़ियों से न केवल आम जनता बल्कि पुलिस-प्रशासन भी धोखा खा जाता है। कई मामलों में देखा गया है कि ये गाड़ियाँ अवैध कारोबार, नशे की तस्करी और ठगी जैसे अपराधों में इस्तेमाल की जाती हैं।
असल में यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि पत्रकारिता को बदनाम करने की संगठित साजिश है।
ईमानदार पत्रकारों का अस्तित्व संकट में
इन फर्जी ‘पत्रकारों’ की वजह से समाज में यह धारणा बनती जा रही है कि पत्रकारिता अब सिर्फ दबाव बनाने या बच निकलने का जरिया है। सच्चाई को उजागर करने वाले ईमानदार पत्रकार आज अविश्वास और उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। उनकी मेहनत, संघर्ष और समाजहित की आवाज को नकली पत्रकारिता दबा रही है।
प्रशासन की जिम्मेदारी और ढिलाई
कानून साफ कहता है कि बिना अनुमति किसी भी गाड़ी पर ‘प्रेस’ या ‘मीडिया’ लिखना अवैध है। फिर भी ऐसे वाहनों पर शायद ही कोई कार्रवाई होती है। यह केवल प्रशासन की लापरवाही ही नहीं बल्कि कुछ मामलों में मिलीभगत की बू भी आती है। यदि समय रहते इस पर सख्ती नहीं हुई, तो पत्रकारिता की गरिमा पूरी तरह खतरे में पड़ सकती है।
समाज और सरकार को दिखानी होगी सख्ती
पत्रकारिता की साख बचाने के लिए समाज और सरकार दोनों को एकजुट होकर पहल करनी होगी।
- फर्जी प्रेस कार्ड और प्रेस गाड़ियों की जांच की जाए।
- अवैध कारोबारियों को पत्रकारिता के नाम पर छूट न दी जाए।
- असली और जमीनी पत्रकारों की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष
पत्रकारिता का उद्देश्य है—सत्य और समाजहित। लेकिन आज यही पत्रकारिता नकली पहचान और प्रेस गाड़ियों के जरिए अपराधियों की ढाल बन चुकी है। यह न केवल लोकतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि असली पत्रकारों के अस्तित्व और साख पर भी सीधा हमला है। अगर समाज और सरकार ने मिलकर इस साजिश पर रोक नहीं लगाई, तो आने वाले समय में पत्रकारिता पर से जनता का विश्वास ही उठ जाएगा।






