
छँट रहा कुहासा तमस का, लो भास्कर ने करवट ली है,
मकर राशि में सूर्य देव ने, आज नई दस्तक दी है।
दक्षिण का पथ त्याग वीर, अब उत्तर की ओर बढ़े हैं,
अंधकार को मात दिलाने, तेज-पुंज रथ पर चढ़े हैं।
*प्रकृति का नव-श्रृंगार*
खेतों में सरसों के पीले, फूल हँसने लगे हैं,
नई फसल की आहट पाकर, किसान सजने लगे हैं।
ठिठुरन की वह जकड़न टूटी, अब बसंत की बारी है,
सृष्टि के कण-कण में देखो, उल्लास की तैयारी है।
गंगा की शीतल लहरों पर, श्रद्धा की अलख जगी है,
स्नान-दान और जप-तप की, आज होड़ सी लगी है।
पाप धूलें सब अंतर्मन के, ऐसा पुण्य कमाना है,
केवल तन को नहीं, हमें तो मन को स्वच्छ बनाना है।
*रिश्तों की ऊष्मा और धार*
तिल-गुड़ की वह संधि बताती, जीवन का सच्चा सार,
ऊपर से तुम सख्त रहो पर, भीतर रखो अपार प्यार।
जब तक गुड़ सा प्रेम न हो, तिल टिक नहीं पाएगा,
बिना संगठन के मानव, जीवन में हार जाएगा।
आसमान में उड़ती वो, नीली-पीली और लाल पतंग,
सिखा रही है कैसे उड़ना, लेकर ऊँची एक उमंग।
“धारदार” हो माँझा लेकिन, किसी का दिल न कटने पाए,
लक्ष्य रहे बस ऊँचा इतना, कि जग झुककर हाथ मिलाए।
*समरसता का संदेश*
भूल पुराने द्वेष और तुम, ईर्ष्या की वह जंग छोड़ो,
टूट चुके जो धागे मन के, उन्हें प्रेम से फिर जोड़ो।
खिचड़ी का यह मेल बताता, भिन्नता में एकता है,
सच्चा मानव वही जगत में, जो दुखियों की पीड़ा हरता है।
शौर्य जगे अब रग-रग में, और आलस का हो संहार,
मंगलकारी सिद्ध हो सबको, यह संक्रांति का त्योहार।
बनो पतंग तुम साहस की, छुओ गगन की ऊँचाई,
बधाई हो, संक्रांति की तुमको, लख-लख बार बधाई।

स्वतंत्र पत्रकार सुधीर चौहान






