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सारंगढ़ में विश्व का अनोखा ऐतिहासिक विजयदशमी उत्सव “गढ़ विच्छेदन” हुआ संपन्न,मोहर सिंह ठाकुर बने विजेता,दो सौ साल से भी अधिक वर्षों से चली आ रही पुरानी परंपरा

सुधीर चौहान की कलम से…

सारंगढ़:- नवीन जिला सांरगढ़-बिलाईगढ़ के रियासतकालीन परंपारिक गढ़-उत्सव का आयोजन आज विजयदशमी पर्व पर खेलभांठा स्थित गढ़ स्थल में संपन्न हुआ। 200 से भी अधिक वर्षो से संपन्न होते आ रहा इस गढ़ विच्छेदन खेल में 25 प्रतिभागीयोंने ने भाग लिया था जिसमे मोहरसिंह ठाकुर ने इस बार गढ़ विजेता का खिताब अपने नाम किया। इस गढ़ उत्सव को आज भी सारंगढ़ राजपरिवार के द्वारा आयोजित किया जा रहा है।

लगभग 25 हजार से भी अधिक की भीड़ यहा पर गढ़ को देखने के लिये इकट्ठा हुए थे। गढ़ विच्छेदन होने के तत्काल बाद रावण का पुतला का दहन किया तथा हजारो की भीड़ सारंगढ़ शहर पहुंचकर मां सम्लेश्वरी और मां काली मंदिर का दर्शन करने के साथ साथ विभिन्न चौक-चौराहो पर विराजे मां दुर्गा का दर्शन भी की।

तथा रात्री मे विभिन्न चौक-चौराहो पर आयोजित होने वाले सांस्कृतिक आयोजनो का लुफ्त उठाती नजर आए। छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति के इतिहास में उपेक्षित रहने वाला सारंगढ़ अंचल मे दशहरा उत्सव को अनोखे ढ़ंग से मनाया जाता है। यहा पर रियासतकाल से ही विजयदशमी पर्व पर गढ़ विच्छेदन का कार्यक्रम आयोजित करते आ रहे है।

वही इस उत्सव स्थान पर विशाल मेला लगता है। नवीन जिला बना सारंगढ़-बिलाईगढ़ का यह एक दुर्लभ उत्सव है। पूरे विश्व का सबसे अनोखा गढ़ उत्सव यहा मनाया जाता है। इस गढ़ उत्सव का आयोजन राजपरिवार सारंगढ़ के द्वारा किया जाता है। छत्तीसगढ़ मे मनाये जाने वाले दशहरा उत्सव के विभिन्न परंपराओ के बीच सारंगढ़ अंचल का दशहरा उत्सव अपनी अलग ही पहचान और गौरवगाथा समेटे हुए है।

इस दशहरा उत्सव का आयोजन लगभग 200 वर्षो से होते आ रहा हे जिसका आयोजन आज भी राजपरिवार गिरीविलास पैलेस करते आ रहे है। इस गढ़ समारोह मे सारंगढ़ के प्रसिद्ध खेलभांठा स्टेडियम के पास गढ़ बना हुआ है यह गढ़ लगभग 200 वर्ष पुराना है यह मिट्टी का एक टिला है जिसके सामने में 50 फीट की मोटाई से मिट्टी का टीला कम होते होते ऊंची होते जाती है ।।

जहा पर लगभग 40 फीट की ऊंचाई पर जाकर यह टीला तीन फीट चौड़ी ही रह जाती है जहा पर ऊपर मे पीछे से सीढ़ी से सुरक्षा प्रहरी टीला के ऊपर मे रहते है वही इस टीला के स्थापना के ठीक सामने लगभग 15 फीट चौड़ा तथा 10 फीट गहरा तालाबनुमा गड्ढा मे पानी भरा रहता है, जहा पर से इस गढ़ मे नुकीला हथियार से गड्ढा करके ऊपर चढ़ते है तथा समीप मे सीमारेखा बनी रहती है जिसके अंदर से प्रतिभागी ऊपर चढते है।

जिसमे उन्हे ऊपर के सुरक्षा प्रहरियो से लोहा लेते है। पूर्व रियासत काल मे यहा की सेना ऊपर मे रहती थी जबकि आजकल ऊपर मे वालेंटियर व उत्सव सहयोगी रहते है। इस आयोजन का शुभारंभ सारंगढ़ राजपरिवार के राजा के द्वारा शांति और समृद्धि के प्रतीक नीलकंठ पक्षी को खुले गगन मे छोडक़र किया जाता है। तथा क्षेत्रवासियो को विजयीदशमी पर्व का शुभकामनाये प्रदान करते है। उसके बाद यह प्रसिद्ध गढ़ उत्सव प्रारंभ होता है जहा पर लगभग 25 से 50 प्रतिभागी इस गढ़ मे चढऩा प्रारंभ करते है।

तथा एक दूसरे का पैर खींच कर विजेता बनने से रोकते है। वही पर जो प्रतिभागी ऊपर के सुरक्षाकर्मी से संघर्ष करके तथा नीचे के पैर खीचने वाले से जीत कर गढ़ पर विजयी प्राप्त करता है उसे सारंगढ़ का वीर की पदवी मिलती है। यह विजेता ही बगल मे स्थापित लगभग 40 फीट ऊंचे रावण को आग के हवाले करता है। तथा विजेता को धोती कुर्ता और 501रू नगद प्रदान किया जाता है। पूर्व  रियासतकाल मे गढ़ विच्छेदन मे विजय श्री धारण करने वाले को राजमहल मे सम्मान के साथ राजदरबार मे बिठाया जाता है।

यहा पर मिट्टी के टिले रूपी गढ़ के ऊपर मे सैनिक रूपी रक्षक रहते है तो वही गढ़ के नीचे मे पानी का गड्ढा रहता है जहा पर प्रतिभागी मिट्टी के टिले को नुकीले औजार से गड्ढा खोदकर ऊपर चढ़ते है और जो प्रतिभागी सुरक्षा प्रहरियो से जद्दोजहद कर गढ़ मे चढऩे मे सफल हुए उन्हे गढ़ विजेता का पदवी दिया जाता है। इस गढ़ उत्सव को देखने के लिये आस पास के लगभग 25 हजार से अधिक की भीड़ इस कार्यक्रम को देखने को लिये पहुंचे थे।

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Sudhir Chouhan

पत्रकार सुधीर चौहान (संपादक) स्वतंत्र भारत न्यूज़ मो.नं.9098259961

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