
सारंगढ़-बिलाईगढ़: अक्सर सरकारी फाइलों में चमकने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जब हकीकत की कसौटी पर कसे जाते हैं, तब व्यवस्था की असली तस्वीर उभर कर सामने आती है। सारंगढ़ ब्लॉक के चार प्रमुख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों—दानसरा, बरदुला, मौहाढोढा और नौरंगपुर में हाल ही में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जब भारत सरकार के राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) के दल ने इन केंद्रों की कार्यप्रणाली, बुनियादी ढांचे और जनसेवा की गुणवत्ता को परखने के लिए मैदानी मोर्चा संभाला।
यह पूरी कवायद जिले की तेजतर्रार कलेक्टर श्रीमती पद्मिनी भोई साहू के स्पष्ट निर्देशों, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. पुष्पेंद्र वैष्णव की रणनीति और खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. आर. एल. सिदार के नेतृत्व में अंजाम दी गई। मूल्यांकनकर्ताओं ने इन चारों केंद्रों के चप्पे-चप्पे का मुआयना किया, ताकि यह तय हो सके कि ग्रामीण जनता को मिलने वाला इलाज केवल खानापूर्ति है या वाकई राष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है।

कागजी लीपापोती नहीं, जमीन पर खंगाली गई व्यवस्था
अक्सर देखा जाता है कि निरीक्षणों की तारीख तय होते ही अस्पतालों की सूरत रातों-रात रंग-रोगन से बदल दी जाती है। लेकिन NQAS की इस उच्चस्तरीय जांच में केंद्रीय मूल्यांकनकर्ताओं का रवैया दो-टूक रहा। टीम ने केवल सरकारी रजिस्टरों के पन्ने नहीं पलटे, बल्कि सीधे उन जगहों पर दस्तक दी जहाँ मरीज का जिंदगी और मौत से वास्ता पड़ता है:
डिलीवरी रूम और जच्चा-बच्चा सुरक्षा: प्रसव कक्ष में संक्रमण नियंत्रण के उपाय, आपातकालीन दवाओं की उपलब्धता और प्रोटोकॉल के पालन की बारीकी से जांच हुई।
पैथोलॉजी लैब और जांच की विश्वसनीयता: केंद्रों पर होने वाली खून-पेशाब जांच की शुद्धता, रिएजेंट्स की एक्सपायरी और रिपोर्टिंग के समय का मिलान किया गया।
ओपीडी और आईपीडी की वास्तविक स्थिति: ओपीडी में डॉक्टरों व स्टाफ की मौजूदगी, पर्चियों का रिकॉर्ड, और वार्ड में भर्ती मरीजों के बिस्तरों की स्वच्छता व सुविधाओं को परखा गया।

दवाइयों का कोटा और वितरण: मरीजों को मुफ्त मिलने वाली जरूरी दवाइयों का स्टॉक रजिस्टर और ग्राउंड पर मौजूद पेटियों की गिनती का मिलान किया गया।
मरीजों से सीधा संवाद: क्या सच में मिलता है इलाज?
मूल्यांकन दल की सबसे अहम कड़ी रही अस्पताल पहुंचे ग्रामीणों से आमने-सामने की बातचीत। अफसरों ने अधिकारियों की मौजूदगी से परे जाकर मरीजों और उनके परिजनों से सीधा सवाल किया—क्या डॉक्टर समय पर मिलते हैं? क्या बाहर की दवा लिखी जाती है? स्टाफ का बर्ताव कैसा रहता है? और क्या प्रसव या जांच के नाम पर कोई परेशानी उठानी पड़ती है? जनता से मिले इस जमीनी फीडबैक को टीम ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट में दर्ज कर लिया है।
परिणाम भविष्य के गर्भ में, मगर अमले का दावा—’हमने झोंक दी पूरी ताकत’
इस कड़े इम्तिहान का नतीजा क्या होगा और क्या ये चारों केंद्र राष्ट्रीय स्तर पर गुणवत्ता का तमगा (NQAS सर्टिफिकेशन) हासिल कर पाएंगे, यह फैसला फिलहाल भविष्य के गर्भ में छिपा है। केंद्र सरकार की तकनीकी रिपोर्ट आने के बाद ही दूध का दूध और पानी का पानी होगा। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस मूल्यांकन को पास कराने के लिए स्थानीय स्वास्थ्य अमले ने कोई कसर नहीं छोड़ी। दिन-रात एक करके अव्यवस्थाओं को दुरुस्त करने का जो जज्बा दिखा, उसने विभागीय कार्यप्रणाली में एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।
फ्रंटलाइन वॉरियर्स से लेकर आला अधिकारियों का साझा पहरा
इस बड़े अभियान को धरातल पर उतारने के लिए स्वास्थ्य विभाग की पूरी फौज मुस्तैद रही। प्रशासनिक समन्वय से लेकर मरीज की नब्ज थामने वाले हर कर्मचारी ने मोर्चे पर जिम्मेदारी संभाली:
जिले और ब्लॉक की रणनीतिक टीम: डीपीएम दीपक धारा, जिला नोडल अधिकारी (NQAS) कृष्णा पूरी गोस्वामी, जिला अकाउंट मैनेजर मनोज साहू, डीटीसी ममता बंजारे, बीपीएम नंद लाल ईजारदार, ब्लॉक नोडल अधिकारी सी. के. पटेल व अरुण नायक, और सेक्टर प्रभारी ओ. पी. कुर्रे ने पूरे प्रशासनिक तालमेल की कमान अपने हाथों में रखी।
निगरानी और तकनीकी अमला: फील्ड में काम को दिशा देने में पर्यवेक्षक आर. के. मैत्री, जी. के. केशरवानी, डी. पी. रात्रे, ममता मैत्री, यू. के. तिवारी, फार्मासिस्ट के. एल. चंद्रा, ओएओ गीता कुमार मनहर, तथा जेएसए रामेश्वर यादव व हरी राम बरिहा ने मुस्तैदी दिखाई।
जमीनी सिपाही (CHO, RHO और मितानिन): प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का चेहरा बने कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स (CHO)—श्रीमती नीमा निर्मलकर, संदीप साहू, ईशा पंकज, रजनी पटेल और ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजकों (RHO)—विकास चौहान, लता वैष्णव, ललिता जांगडे, हरिलाल जांगडे, कृष्ण कुमार पटेल, नीतू शर्मा, पी. पी. साहू, श्रीमती मिलन पटेल सहित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के समस्त स्टाफ, मास्टर ट्रेनर्स (MT) और गांव-गांव दौड़ने वाली मितानिनों का योगदान इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ रहा।
अब देखना यह होगा कि दिल्ली से आने वाली अंतिम रिपोर्ट सारंगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर मुहर लगाती है या फिर सुधार के नए पन्ने खोलती है। बहरहाल, इस व्यापक पड़ताल ने इतना तो साफ कर दिया है कि ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र को अब केवल दावों के सहारे नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कसौटियों पर अपनी उपयोगिता साबित करनी होगी।






