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फ्रांस का राजनीतिक संकट: क्या लोकतंत्र केवल आँकड़ों तक सिमट गया है?

एक लोकतांत्रिक देश की कहानी, जहाँ जनता और संसद दोनों सरकार से भरोसा खोते जा रहे हैं: डॉ. सुधीर सिंह गौर, सहा. प्राध्यापक, के.आर.पी.जी. लॉ कॉलेज, बिलासपुर छ.ग. ________________________________________

फ्रांस, जिसे यूरोप में लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता का मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है, इन दिनों अभूतपूर्व अस्थिरता से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री फ्राँस्वा बैरू का अविश्वास मत में गिरना महज़ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि यह चेतावनी है कि आर्थिक आँकड़ों के बोझ तले अगर जनता की आवाज़ दबाई जाएगी, तो कोई भी लोकतंत्र टिक नहीं पाएगा। 

सरकार का तर्क था कि देश का कर्ज़ GDP के 114% तक पहुँच गया है और बचाव केवल कठोर कटौतियों से ही संभव है। लेकिन सवाल उठता है—क्या देश चलाना केवल किताबों के हिसाब-किताब का खेल है? 
क्या यह उचित है कि घाटा कम करने के नाम पर आम जनता से छुट्टियाँ छीनी जाएँ, पेंशन और भत्ते घटाए जाएँ, जबकि सत्ता और बड़े कॉरपोरेट वर्ग अपनी सुविधाएँ बनाए रखें? 

फ्रांस की संसद ने बैरू सरकार को गिरा दिया, मगर सच्चाई यह है कि असली विरोध संसद तक सीमित नहीं है। सड़कों पर “Block Everything” आंदोलन से लेकर यूनियनों और छात्रों तक हर कोई इस बात पर सवाल उठा रहा है कि आखिर संकट की कीमत हमेशा आम लोग ही क्यों चुकाएँ? 
यह स्थिति बताती है कि लोकतांत्रिक देशों में भी जब फैसले जनता से दूरी बनाकर लिए जाते हैं, तो असंतोष का ज्वालामुखी भड़कना तय है। 

फ्रांस में समस्या यह नहीं है कि घाटा कैसे कम किया जाए। समस्या यह है कि सत्ताधारी वर्ग जनता से संवाद करने में नाकाम हो रहा है। लगातार प्रधानमंत्री बदलना, संसद में बहुमत न जुटा पाना और जनता को भरोसे में न लेना—ये सब मिलकर यह साबित करते हैं कि फ्रांस की राजनीति आज विश्वास के संकट (crisis of trust) में फँसी है। 

यह संकट केवल फ्रांस की समस्या नहीं है। यूरोप के कई देश ऋण और बजट घाटे से जूझ रहे हैं। अगर फ्रांस जैसा बड़ा लोकतंत्र जनता से कटकर केवल “आर्थिक अनुशासन” थोपने की कोशिश करेगा, तो बाकी देशों के लिए भी यह एक खतरनाक मिसाल बनेगा। 
लोकतंत्र की असली ताक़त चुनावों से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद और सहभागिता से आती है। 

फ्रांस के लिए यह वक्त कठिन है, लेकिन सुधार का रास्ता साफ़ है। अगर सरकारें समझें कि लोकतंत्र का आधार केवल बजट बैलेंस करना नहीं बल्कि जनता का विश्वास अर्जित करना है, तभी राजनीतिक स्थिरता लौट सकती है। वरना संसद में गिरी हुई सरकारें और सड़कों पर उबलता गुस्सा एक दिन लोकतंत्र को खोखला कर देंगे।

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Sudhir Chouhan

पत्रकार सुधीर चौहान (संपादक) स्वतंत्र भारत न्यूज़ मो.नं.9098259961

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