
सारंगढ़:- दिसंबर का सुहावना ठंड भरा मौसम आते ही कुछ चीजें याद आने लग जाती हैं। नरम गर्म स्वेटर, जैकेट और साथ में जिंदगी के बीते सुहावने पल। तो इस मस्त मौसम में मैंने भी अपने स्वेटर, जैकेट व गर्म ऊनी कपड़े निकाले और उसे धूप दिखाया। तभी अचानक जैकेट के जेब में मेरा हाथ गया और मेरे हाथों में आए बस के दो टिकट। उसे मैंने ध्यान से देखा कि यह टिकट कहॉं का है। तभी मुझे ख्याल आया कि वह टिकट मेरी सांरगढ़ से बिलासपुर के सफर की थी। उस दौरान ऐसी सुहानी दिसंबर के ठंड महीने में मुझे कवि सम्मेलन के लिए बेमेतरा जाना था। मैं अपने मायके सारंगढ़ से बिलासपुर जाने के लिए बस पकड़ी थी। जल्दबाजी में सामान पकड़ कर मैं बिलासपुर वाले बस में बैठ गयी। मुझे बस ट्रेन के सफर में खिड़की के पास बैठना बहुत पसंद है। उस दिन मुझे बस में खिड़की वाली जगह भी मिल गयी।

मैं मुस्कराते हुए पीछे के सीट में खिड़की के पास बैठ गयी। मेरी बगल वाली जगह ख़ाली थी। थोड़ी देर में बस अपने सफर पर चलने लगी। मैं खिड़की से बाहर के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने लगी और कल्पनाओं में खोने लगी। तभी एक गॉंव में अचानक बस रूकी और बहुत से यात्री उसमें चढ़े। सब सीट भरने लगा। मैंने एक बुजुर्ग दादी को अपने साथ बैठने को बोली और वह बैठ गयी। बस पुन: चलने लगी और मेरी नज़र उस दादी पर पड़ी। वह बहुत सीधी-साधी हमारे छत्तीसगढ़ी संस्कृति के अनुरूप वेशभूषा में थी, जो अब देखने को नहीं मिलता। मोटा हरा लुगरा, हाथ में बाजूबंद, दोनों नाक में बड़े-बड़े फुली, माथे पर बड़े लाल रंग की बिंदी। बस आगे बढने लगी। मैं उनको देख ही रही थी कि बस का कंडक्टर टिकट-टिकट करते हमारे पास आया। मैं पैसे निकालकर तैयार थी।

कंडक्टर भैय्या पहले उस दादी का टिकट काटने लगा, "माता जी कहॉं जाना है?" बुजुर्ग महिला कहती हैं, "गिधारौ जाना है।" "हॉं तो 80 रूपए दीजिए।" दादी अपना पैसा निकालने लगी तो देखती है कि उसका पैसा वाला छोटा बैग नहीं है। वह शायद कहीं गिर गया था। वह परेशान हो जाती है और बोलती है, "बेटा पैसा तो मेरा गिर गया है, मेरे पास पैसा नहीं है।" कंडक्टर ग़ुस्सा कर कहता है कि अगर पैसा नहीं है तो यही पर उतार दे रहा हूँ। दादी बोली, "बेटा मुझे ले चल, मैं कैसे करूंगी।" यह कहकर दादी का चेहरा उदास व आंखें भर जाती है।

मैं यह सब देख रही थी कि किस तरह कंडक्टर बद्तमीजी कर रहा था। दादी बहुत अधिक परेशान हो रही थी। तभी मैंने कंडक्टर को कहा, "आप इस दादी जी को कुछ मत बोलिए, मैं दादी का और अपना टिकट देती हूँ।" और उस कंडक्टर को दोनों के टिकट के पैसे दे देती हूँ। मेरे द्वारा टिकट के पैसे देने पर दादी की आंखें नम हो जाती है और वह मुझे बहुत सारा आशीर्वाद देने लगती है। "धन्यवाद बेटी" और साथ ही अपने बारे में बताने लगती है कि, "मैं अच्छे घर से हूँ, मेरा बेटा शिक्षक है।

वह मुझे पैसा दिया था पर मेरे से वह घूम गया।" और अंत तक वह खूब आशीष देती है। उस दिन उस दादी की परेशानी दूर करके और आंखों से ऑंसू दूर करके यह महसूस हुआ कि वह मुझे कुछ मदद के बदले कितना बहुमूल्य आशीर्वाद दे गयी थी। शायद मैं अब उनसे और कभी नहीं मिल पाऊँगी पर वह दादी और वह यात्रा मुझे हमेशा याद रहेगा। इसी तरह जीवन की कुछ घटनाएँ हमेशा हमारे स्मृति पटल पर अंकित हो जाती हैं, जो बीच-बीच में हमें याद आती हैं।






